एक बार इंद्र, वायु,
अग्नि आदि देवों में
बड़ा वाद-विवाद हुआ
। प्रत्येक कहता था कि
मैं श्रेष्ठ हूँ ।
इंद्र
ने कहा, “मैं वर्षा करता
हूँ । यदि वर्षा
न हो तो पृथ्वी
सूख जाय और जीवन
असंभव बन जाय ।
वायु
ने कहा, “ यदि पानी न
बरसे तो एक बार
चल सकता है, लेकिन
हवा तो सबसे पहले
मिलनी चाहिए। मैं ही सबसे
श्रेष्ठ हूँ।
अग्नि
ने कहा,
सबसे
पहले गर्मी का होना आवश्यक
है । उष्णता होनी
ही चाहिए । उष्णता समाप्त
होते ही आदमी ठंढा
हो जाता है ।
अग्नि के बिना सब
बेकार है 1
यह वाद-विवाद चल
ही रहा था कि
वहाँ एक तेजस्वी देवी
आयी । देवता बड़े
चक्कर में पड़े कि
यह देवी कौन है,
कहाँ की है ?
अग्नि
ने कहा, “मैं देवी के
पास जाकर सारी जानकारी
प्राप्त कर लाता हूँ
। अग्नि उस देवी के
पास गया और पूछने
लगा,
आप कौन हैं ?
आप कौन हैं ? "
उस देवी ने उलटे
अग्नि से ही प्रश्न
किया, “ अग्नि ने चिढ़कर कहा,
देवी ने कहा, आप
क्या करते हैं ? ”
“ मेरा
नाम मालूम नहीं ? मैं अग्नि हूँ
" आप
क्या करते हैं ?
अग्नि
ने क्रोधित होकर कहा, “मैं
सारा विश्व एक क्षण में
जला सकता हूँ ।
क्या तुम्हें मेरा पराक्रम मालूम
नहीं है ?"
देवी
ने कहा, “ होगा पराक्रम, मुझे
तो मालूम नहीं है ।
लेकिन यह एक तिनका
है, इसे जरा जलाकर
तो दिखाओ ।
"अग्नि
ने अपनी ज्वाला प्रज्वलित
की लेकिन वह तिनका नहीं
जला । अग्नि लज्जित
हो गया। वह सिर
नीचा करके चला गया
।
इसके
बाद वायु आया ।
वायु
ने प्रश्न किया, आप कौन हैं ?
देवी
ने उससे पूछा,आप
कौन हैं ?
वायु
घमंड के साथ बोला,
"मैं वायु हूँ।
देवी
ने फिर पूछा,
आप क्या करते हैं
?
वायु ने क्रोधित होकर कहा, मैं पर्वतों को गेंद की तरह उछलता हूँ, प्रचंड लहरें पैदा करके जहाजों को डुबा देता हूँ । क्या तुम्हें
मेरे ये पराक्रम मालूम नहीं हैं ? '
देवी ने कहा, “ नहीं । देखो, यहाँ एक तिनका है, जरा इसे उड़ाकर तो दिखाओ । ”
वायु ने अपनी सारी शक्ति लगा दी लेकिन क्षुद्र तिनका अपने स्थान से नहीं हिला । वायु लज्जित होकर सिर नीचे किए चला गया।
इसके बाद देवराज इंद्र देवी के पास आये । उन्होंने भी अन्य देवों की तरह देवी से प्रश्न किया, कौन हैं आप?
देवी ने इंद्र से पूछा, पहले आप बताइए कि आप कौन हैं ? " इंद्र बड़े गर्व से बोले, " क्या आप नहीं जानतीं कि मैं देवताओं का
राजा इंद्र हूँ । मैं चाहूँ तो सारे विश्व में प्रलय मचा सकता हूँ । मैं सारी पृथ्वी को पानी में डुबा सकता हूँ ।'
देवी ने बड़ी उपेक्षा से कहा, ठीक है, यह एक छोटा सा तिनका है, इसे पानी में डुबा दो ।
इंद्र ने भरसक प्रयत्न किया, पर वे उस तिनके को नहीं डुबा सके । वे लज्जित होकर धरती की ओर देखने लगे । इस प्रकार सारे
घमंडी देवता परेशान हो गये ।
इसके बाद देवी कहने लगी, " ओ घमंडियो ! मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ, ऐसा कहकर क्यों लड़ते हो ? न कोई श्रेष्ठ है, न कोई तुच्छ ।
उस विश्वशक्ति ने इंद्र को पानी बरसाने की शक्ति दी है, अतः इंद्र पानी बरसा सकता है अग्नि को जलाने की शक्ति दी है, अतः
वह जला सकता है । वायु को बहने की शक्ति दी है, इसलिए वायु बहता है । वह विश्वशक्ति यदि अपनी शक्ति वापस ले ले तो
तुम सब शून्य हो । अपनी शक्ति पर घमंड मत करो । अपनी विशेष शक्ति के कारण दूसरे को हीन मत समझो। "
अंत में देवी ने कहा,जो शक्ति देवताओं में काम करती है, वही मानवों में काम करती है ।
कोई मानव इस शक्ति के बल पर अपने आपको बड़ा न समझे । रणभूमि पर लड़नेवाले सिपाही को ज्ञानी पंडित तुच्छ न
समझे। व्यापारी को सिपाही छोटा न समझे । सेवक को व्यापारी हीन न समझे । हर- एक का काम उपयोगी है, महान है । अतः
जब हम एक दूसरे से मिलें तो राम-राम' कहकर मिलें । ' राम-राम' से तात्पर्य है, तुम भी राम हो, मैं भी राम हूँ ।
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