मेरी साइकिल..(एक कॉमेडी कहानी )

 बरामदे में आया तो बरामदे के साथ ही एक अजीब गरीब मशीन पर नजर पड़ी. ठीक तरह से पहचान न सका के क्या चीज है.नौकर से पूछा." क्यों बे! क्या चीज है? नौकर बोला" हुजूर बाइ साइकिल है " मैंने कहा "बाइ साइकिल"?" किसकी बाइ साइकिल" कहने लगा" मिर्जा साहब ने भिजवाई है आपके लिए "

मैंने कहा" जो बाइ साइकिल रात को उन्होंने  भेजी थी वह कहां गई ? 
 कहने लगा" यही तो है"
 मैंने कहा " क्या बकता है जो बाइ साइकिल मिर्जा साहब ने कल रात को भेजी थी वह बाइ साइकिल यही है? " कहने लगा" जी हां"
 मैंने कहा" अच्छा!" और फिर उसे देखने लगा" इसको साफ क्यों नहीं किया ?"
" हुजूर! दो-तीन दफा साफ किया है"
 नौकर ने इससे ज्यादा कहना शायद मुनासिब न समझा.
" और तेल लाया ? "
" हां हुजूर लाया हूं"
" दिया? "पहिए को घुमा घुमा कर वह सुराग तलाश किया जहां किसी जमाने में तेल दिया जाता था. लेकिन अब उस सुराख में से आमद व रफत का सिलसिला बंद था. इसलिए नौकर बोला. " हुजूर वह तेल तो इधर-उधर बह जाता है. बीच में तो जाता ही नहीं. "
" हुजूर वह तेल देने की सुराग होते हैं ' नहीं मिलते"
" क्या वजा? "
" हुजूर धरों पर में मेल और जंग जमा है. और सुराग कहीं बीच ही में दबदबा गए  हैं" रफ्ता रफ्ता मैं इस चीज के करीब आया. जिसको मेरा नौकर बाइ साइकिल बता रहा था.
मैंने कहा" अच्छा ऊपर ही ऊपर डाल दो. यह भी फायदेमंद होता है. " 
आखिरकार बाय साइकिल पर सवार हुआ. घर से निकलते ही कुछ थोड़ी सी उतराई थी. उस पर वह साइकिल खुद-ब-खुद चलने लगी. लेकिन इस रफ्तार से जैसे तारकोल जमीन पर बहता है ' और साथ ही मुख्तलिफ हिस्सों से तरह-तरह की आवाज़ बरामद होना शुरू हुई. इन आवाजों के अलग-अलग ग्रुप थे. ची, चा, चू की किस्म की आवाजे ज्यादातर गददी के नीचे और पिछले पहिए से निकलती थी. खट, खड़ खड़, खट्टर की आवाज से मत घाटों से आई थी. चरचर, चरख चरख की किस्म की सूर जंजीर और पैदल से निकलते थे. जंजीर  धिली थी. पिछला पहिया घूमने के अलावा झुमता है भी था. यानी एक तो आगे को चलता था इसके अलावा दाहिने से बाएं और बाएं से दाहिने को भी हरकत करता था. चुनाचा सड़क पर जो निशान पड़ जाता था उसको देखकर ऐसा मालूम होता था जैसे सांप लहरा का निकल गया है. मडगार्ड थे तो सही मगर पहियों के ठीक ऊपर ना थे. पहीया के टायर में एक बड़ा सा पेबनद लगा था' जिसके वजह से पहिया हर चक्कर में एक दफा लम्हा भर को को जोर से ऊपर उठ जाता था और मेरे सर पीछे को यूं झटका खा रहा था जैसे कोई लगातार थोड़ी के नीचे मुकके मारे जा रहा हो.

पुर्जे जो अब तक सो रहे थे बेदार होकर गोया हुए. इधर-उधर के लोग चौके. मांओ ने अपने बच्चों को सीने से लगा लिया. कठरकठर के बीच में पहियों की आवाज जुदा सुनाई दे रही थी. लेकिन क्योंकि बाइ साइकिल अब पहले से तेज थी इसलिए" चूचू फट"ने" चचु फट" की सूरत बदल ली थी. इस कदर तेज रफ्तारी से दो तब्देलिया वकया हो गई. एक तो हैंडल एक तरफ को मुड़ गया जिसका नतीजा यह हुआ के मैं जा तू सामने को रहा था लेकिन मेरा तमाम जिसम दाएं तरफ को मोडा था. इसके अलावा बाय साइकिल की गददी तकरीबन 6 इंच के करीब नीचे बैठ गई. चुनांचा जब पैढल चलाने के लिए मैं टांगें ऊपर नीचे कर रहा था तो मेरे घुटने मेरी तोड़ी तक पहुंच जाते थे. कमर दूहरी होकर बाहर को निकली हुई थी. गाददी का नीचा हो जाना बहुत तकलीफदाह साबित हुआ. इसलिए मैंने मुनासीब यही समझा कि उसको ठीक कर लो. चुनांचा मैं साइकिल को रुका दिया और नीचे उतरा.
भाई साइकिल के ठहर जाने से यकत लखत जैसे दुनिया में खामोशी सी छा गई. ऐसा मालूम हुआ जैसे मैं किसी रेल के स्टेशन से निकाल कर बाहर आ गया हूं. जब से मैं औजार निकला, गददी को ऊंचा किया, कुछ हैंडल को सीधा किया और दोबारा सवार हो गया. दस कदम भी ना चलने पाया था कि एक हैंडल. एकदम से नीचे आ गया इतना के गददी आप हैंडल से कोई फिट भर ऊंची थी. मेरा तमाम जिसम आगे को झुका हुआ था. तमाम भोज दोनों हाथों पर था जो हैंडल पर रखे थे और बराबर झटका खा रहे थे. अब मेरी हालत का तसव्वर करें तो आपको मालूम होगा कि मैं दूर से ऐसा मालूम हो रहा था जैसे कोई औरत आटा गूंद रही हो. मुश्किल से बीस कदम गया होगाँ क्या मेरी साइकिल का अगला पहिया बिल्कुल अलग होकर लुढ़कता हुआ सड़क के उस पर जा पहुंचा. और बाकी साइकिल मेरे पास रही.
 मैंने फौरन अपने आप को संभाला जो पहिया अलग हो गया था. उसको एक हाथ में उठा लिया. दूसरे हाथ में बाकी मंदा साइकिल को थामा और खड़ा हुआ.


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