सबसे अच्छा कौन?

 एक जगह कुछ लोग जमा थे. तीन-चार आदमियों में बड़ी जोर की बहस हो रही थी. फिर एक कहता मैं सबसे अच्छा हूं इस झगड़े में तू तू मैं मैं तक नौबत पहुंच गई.  इत्तेफाक से एक और आदमी वहां आ गया. उसने कहा भाइयों! क्यों लड़ते हो. बात क्या है? मैं भी तो सुनो.

एक बोला भाई मैं बुनकर हूं. मेरा पूरा खानदान मेहनत करता है, जब कहीं कपड़ा तैयार होता है. मैं कपड़ा ना बनाओ तो लोग गर्म, सरद मौसम का बचाव ना कर सके. सब नंगे फिरा करें. और जानवर बन जाए जानवर. फिर किसी की क्या इज्जत रह जाएगी. मेरी ही बदौलत सब थाटबाठ है. कहो दुनिया में मुझे अच्छा कौन हो सकता है ?


दूसरा बोला. भाई जान. इनकी आप सुन चुके. आप मेरी सुनिए. मैं किसान हूं. खेती-बाड़ी मेरा काम है. हल चलाता हूं, जमीन जोतता हूं, गर्मी, सर्दी, बरसात, हर मौसम में खेत है और मैं हूं. जब कहीं जाकर दुनिया को अनाज पहुंचता है. मैं अनाज ना उगाओ तो दुनिया भूखे मर जाए. कोई होगा नहीं तो इसके कपड़े पहनेगा कौन? मेरे दम से दुनिया आबाद है. भला बताओ दुनिया में मुझे अच्छा कौन है?

तीसरे ने कहा. बस इनकी कहानी खत्म हो चुकी. जरा अब मेरी सुनिए. मैं हूं लोहार, लोहा भी मेरा लोहा मानता है, चल चलती धूप में आग सामने बैठता हूं. लोहे को पिघला देता हूं और घन से पीट पीट कर मोम कर देता हूं. और फिर उससे जो चाहता हूं बना लेता हूं, अपना खून पसीना एक कर देता हूं, जब कहीं जाकर खुरपा, कुदाल, फावड़ा, कुल्हाड़ी, आरा और हल वगैरह बनते हैं. मेरे बेगर ना किसान का हाल चल सकता है और ना बुनकर का कारघा. फिर दुनिया में सबसे अच्छा मैं हुआ कि यह लोग? 


चौथा बोला, बस बस सब अपने मुंह आप मियां मिट्ठू बन चुके अब जरा दूसरों को भी कहने दो, देखो भाई जान मैं एक गरीब कुमहार हूं, अगर मैं और मेरा गधा ना होता तो पीई किस चीज में रखते, खाना किस चीज में पकाते, घर की छतो के लिए खपरैल कौन देता, इटे कहां से आती. ना खाने के इंतजाम न रहने का ठिकाना बंदर की तरह पेड़ों पर उछलते फिरते. मैं तो  नहीं कहता कि मैं ही सबसे अच्छा हूं.  मगर तुम खुद ही कहना की कौन सबसे अच्छा है ?


पांचवें ने कहा भाइयों! मैं सबकी सुन चुका. अब जरा सबर से मेरी सुनो. यह जमीन और दुनिया खुदा ने बनाई है. हम सब इंसान उसके सवारने  वाले हैं. हर एक अपनी लियाकत के मुताबिक उसे सवारता है. एक दूसरे की मदद बिना इस दुनिया में काम नहीं चल सकता कोई अपने कलम से इसे बनता है. कोई कुदाल फावड़ा से, काम के एतबार से नाम पड़ गए. कोई बाबूजी बन गए. कोई शायर कहलाए, कोइ पत्रकार,कोई किसान, लोहार, कोई बडि और कुमार बन गए. काम से कोई छोटा होता है. ना कोई बड़ा बनता है. यह काम तो दुनिया को सवारने और आपस में एक दूसरे की मदद करने के लिए है. नादानों ने यह बात भुला दी. कोई चौधरी बना, कोई सरदार. और कोई राजा बादशाह बन बैठा और अपने आप को आम इंसानों से अलग रखकर इतराने लगे. खिदमत करने वाले को गिराते गिराते चमार, भंगी और अछूत कर दिया. सच पूछो तो ना राजा ऊंचा है ना चमार नीचे, सब इंसान बराबर है. एक आदम की औलाद है. जिनके गुण अच्छे वही ऊंचे हैं. यह खानदान, नामोनिशान, एक दूसरे को पहचानने के लिए है. जो इंसानों की खिदमत करता है वही अच्छा इंसान है. चाहे वह किसी घर, किसी मुल्क या किसी जमाने में हुआ हो., "

 यह तकरीर सुनकर सब ने कहा. भाई यह बातें तो दिल को लगती है यह बहुत अच्छा फैसला है. हम सब इसे मानते हैं. फिर सब एक थाली में सत्तू घोले और मिलबैठकर भाइयों की तरह खाने लगे.

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